Friday, 10 July 2015

तुम हो कौन?

कभी अपने कपड़ों को देखता हूँ
कभी तुम्हारी पसन्द टटोलता हूँ
बहुत ही अलग है हम लोग
फिर भी पासपोर्ट पर भारतीय लिखा है।

खाना, संस्कार, बोलचाल, गाना, दिल सब कुछ घुलमिल से गए हैं
जात, धर्म, समुदाय, परम्परा कुछ धुंधला हो रहे हैं
महानगर की छूट, ओर पुश्तैनी गांठों का खुल जाना
विदेश का आभास, रहन-सहन की नयी संभावनाएं।

भाषा के विकल्प, जन्मभूमि ओर कर्मभूमि का विच्छेद
सभ्यताओं का दंगल, दोस्ती और प्यार
कुछ तय नहीं, और साल जैसे भागदौड़ में हैं
ईस सब मे कभी सोचा है, कि तुम हो कोन?

नोकरी, धंधा, रिश्तेदार, और पर्दे पर ये अजीब कलाकार
अटपटे विघयापन, टूटी-फूटी सोच का सिरदर्द
देखा-देखी की भेड़चाल
ईस सब मे कभी सोचा है, कि तुम हो कोन?

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